जब-जब सपने देखे तकलीफें हुई
शीशे को गले लगा के जख्मी हुए
टूटी है उम्मीदे जब भी रखी
और कोई कहता है उम्मीद पे जिदंगी टिकी है
अब अफसोस करता हूं जिसने मेरी आँखे बनाई
कैसी रोशनी इनमें ढाली सब दिखता है
सिवा उम्मीद से सँवरी जिंदगी के।

Advertisements