अब न कुछ कहता हूँ जो कोई दे जाता है दर्द मुझे
हँसते-हँसते उठा लेता हूँ ज़ख्मों को
अनगिनत हैं जो दे जाते हैं दर्द यहाँ
कई रिश्तेदारी हैं तो कई बाहरी
करें भी तो कितनों से जुबान-ए‍-अनबन
के एक खयाल से सहा की बना लूं शख्त खुद को
के जब आये वो शख्स टूट के
मे उसे सहारा दे सकूं।

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