गुजर रहा था सुन्सान राह से
मौसम भी थमा थमा सा था
हिलने लगी फिर झाडि़यां
हवा का नामोनिशान न था
महसूस कि मैने रूह उसकी
न जाने वो क्यूं कहते थे
मेरा तुम्से कोई वस्ता नहीं। ‌‌

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