समन्दर से स्याही लेकर हवा की कलम से
धरती के पर्चे पर सपनों से एक परी उतारी है मैंने
बहारों के रंगो से अब संवारना है उसे
बिखरे कोहरे सी उसकी जुल्फें
गुलाब की पंखुड़ियों पे शबनम से उसके होठ
सूरज की किरण सी चमकती उसके नाक में वो फुल्ली
ब्रहकमल सा दमकता रूप उसका
तनिक क्षणभर उसका दिखना
मानो इस जहाँ में जीवन की छटा बिखेरे हो
उसकी बतियों से छलकता है जो पाकपन
कैसे मासूमियत भरे है उसकी खिलखिलाती हँसी में।

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