कर गई आज नियती मुझसे गुफ्तगू
न कर दर्द उस बात का
उस चीज का जो तुझे मिल न सका
ये बस भ्रम तेरा था
जो तू ख्वाहिश कर बैठा किसी बेगाने लम्हों की
कर लेता बस में ये मोह अपना
तो न जलता कभी ह्रदय तेरा
जो लिख दिया है तेरे हिस्से में उसकी भी न बेसब्री कर
चल आयेगा वो एक दिन तेरे पास
विधाता ने लिखा जो तेरे हिस्से मे है
अब दर्द का जो सार है
वो बस मोह और इच्छा है
प्रभाव इनका तनिक क्षण का है
एक क्षण न अडिग रह पाये तुम मोह बिना
पूछते हो विधाता ये दर्दभरी नियती क्यूँ है।

Advertisements