देखे हैं फूल बहुत गुलिस्तां में
एक फूल देख के बस नजरें ठहर गई
ओस की बूँदे पंखुड़ियों मे
वो चिलचिलाती धूप उसके साये से
वो स्पर्श गुलाबी रंग का जैसे हसी दिल सा
लाख बुराइयों से पहरेदारी करते हो कांटे उसके
मानो टूटे इन्सा की बहादुरी हो
हिलता डुलता वो बेखौफ सा फूल
लगे इश्क में तन्हा दिल सा
इन्तजार मे खिला है कहीं दूर
रंग उसका खिला खिला सा
लग रहा है इश्क से भरपूर
कांटे जिस्म पे उसके
जैसे सीख लिया हो टूट के सम्भलना
अब न डर आसपास है कहीं
टूट जाने का सम्भल जाने का
तोड़ आया शायद वो झूठा सा रिश्ता किसी का
आज चेहरे मे बसा नूर सा है।

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