कभी आँखो पे लगाया कभी इन लब्बो
कभी तकिये में कभी बाहों में भर लिया
कई अधूरी ख्वाहिशे पूरी की जो बनी थी बेचारी
हर दिन मुलाकाते होती है इससे बन सँवर के
बस अब तक कुछ न बोली वो बन के जुबा मेरी
जब भी देखा आईना संग उसे पाया
साथ दोनो का कितना इस मन को भाया
मिटा गये सारे सपने कागजों के
फाड़ के उसकी तस्वीरें भुला गये वो झूठी मुलाकातें

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