बादलो का अासमा सोंदर्य के इस धरातल पे
कोहरे का पेड़ो की गेसूओं को मंद-मंद छु के गुजरना
वो बादलो का तवस्सुम कोहरे की चंचलता देख के
बिना रुके वो भी बरस आए इनके गेसूओं को भीगोने
एक दीवानी सी महक उनके भीगे बालो की
वो छोटे-छोटे मखमली कपड़ो की
जिसको ओढ़े है इस धरोहर की मिट्टी अपने तन पे
वो छोटे-छोटे अनेक किस्म के फूलनुमा
पोधों की कलाकारियाँ उन कपड़ो पे
सहज इस मन मे है अमिट छाप लिए बैठी
वो गधेरों का सोरगुल करके जमी को छेड़ते गुजरना
तकलीफ़ों मे बड़ी राहत मन को दे जाती ये सोखियाँ
अब हो शाम तो थोड़ा आराम कर ले ये सब
फिर लौट आए कल नयी ताजगी लेकर
क्या ये समंदर भी कभी थकता नहीं यूं हरदम चल कर इसकी शांति और गहराई तो उधारण है इस युग पर
वो हवा का गेसूओं से खेलना
वो ठंडी सी लहर कानो से गुजरना
वो बहारों का सजना सवरना मौसम देख कर
अलाप खूबसूरती लेकर मटकते-मटकते गुजर जाना
भावनाओ का संगम उमड़ जाता है ये देख के इस मन मे
बादलों का अासमा सोंदर्य के इस धरातल पे

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