मुहब्बत की जडे हसी पलो की डालियाँ
फैला रही हैं देखो दिन-ब-दिन कैसे
नई कोंपलें नई अदाओं की
आज बिन मौसम फूल खिल आये
उसकी चाहत के
धीरे-धीरे चढ रहा है नशा पानी सा
भवरे भी मंडराने लगे  दिवाने से
महक है उसकी कुछ एेसी
मिठास हो शहद मे जैसे
शीतल जल पंखुडियों पे
लगे रूप तेरा सा
हवा से उसका हिलना-डुलना
लगे साया तेरी जुल्फों सा
हवा का उद्दगम जैसे पतियों से
लगे इक नया जीवन तेरे आने से
रात को चाँद लगे टहनियों पे लटका जैसै
दीदार हो तेरे रूख का जुल्फें हटा के जैसे
नई बहारें हैं आई अब तो लौट आऔ
पतझड़ मे पतियों सा कहीं टूट के हम
बिखर न जाए

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