समेट लिये कुछ बेमिसाल लम्हें दिल की दराज में
अब जी रहे हैं टुकड़ो मे तो
छोड़ दिया तेरे लम्हों की टुकड़ियां सिना
अब जी लूँ वो लम्हें जो हैं मुझपे
थोड़ा मुख्तसर अब इन्हें न करू
गिरफ्ता कर लूँ कहीं खुद को इनमे
के दिल के दरमियाँ कोई काफिर सा न रहे

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