एक साँस अटकी सी एक पल रूका सा
कुछ बात करते-करते एक नजर रूकी-रूकी सी
दो आँखे हेरा-हेरा सी रूख से गुजरी मेरी
मन में कुछ सोचते-सोचते थोडा़ मुस्काते-मुस्काते
एक मदहोश नजर गुजरी जब रूख से उसकी
ठहर सी गयी थी कुछ पल नजर मेरी
कानों मे मधुरता का संगम
सुन के कुछ स्वर उसके
संगीत क्या है ये जान गये
हवाओं मे घुली सी उसकी महक
साँसो को ताजा कर गयी
होती है शाम भी इतनी हंसी
देख रहा हूँ
उसकी सादगी सी मानो शाम में महक गयी
“आरजू” होती है इतनी भी हंसी
समझ रहा हूँ
उम्मीद नही मुड़ के देखने की भी जहाँ
राह देख रहा हूँ
किसी के लौट आने की

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