बना दी एक झूठी सी कहानी
जिदंगी को झूठा सा जीवन
बिना रूह के जीना
बेमतलब की हंसी तन्हाई की
बेइन्तहा अस्ख भी खुशी के
कुछ याद दिला गयी बीते लम्हों की
देख के आज एक शख्स याद है आई
उसके मगरूरियत की तबाह कर गयी थी जो रूह मेरी
साँसों को महसूस न हो सिसकियाँ, इस डर से थोड़ा गुमसुम रहा
देख के कयामत मेरी न रूकी ये पानी की बूँदें
चली है आज भी राहत मेरी मुझसे दूर गिरते सभलते
इक पल न ठहरे की कहता कुछ पल आराम करलो मेरी निगाह में
अब जो गये ही हो मुझसे दूर तो खयाल अपना रखना
फिर होगा कोई और पल मुझसे गुजरना तेरा
अभी न रोका की कोई और समा है सुकून का
चाहते हो जो दूर रहना गम मे भी झूठी हंसी लेके आना
उदासी जो छाई तुम पे तो रख लूगां निगाह में की
जाने की कोई राह न बचे

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