ख्वाहिश थी सामने मेरी
पाने को दिल भी बेकरार था
छोड़ दिया वो लम्हा
जो बन गया था रहगुजर मेरा
अब न राहो का कोई फासला रहा था
वो मुकाम हम पीछे छोड़ आये थे
मुडती है आज भी निगाहें पीछे
कुछ पीछे छूट जाने का दिल को अन्देशा होता है
टपकी है ये आँखे आज फिर से
दर्द क्या है न याद रहा
फासला क्या है न याद रहा
इन्तजार आज भी चंद बातों का है
वो बाते क्या है न याद रहा
अब भी घने हैं सपनो के बादल
भरा कोई चेहरा रहता है उनमें हरवक्त
चेहरा है किसका न अब वो शख्स याद रहा
बे जा सपनो मे भी न जाने कैसे वो
तब्बसुम खिला-खिला सा रहा

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