कभी सोचता हूँ तन्हा होके ये जिंदगी क्या पहेली है कभी लगे उलझी सी है कभी लगे सुलझी सी है
उलझन मे है ये राहे कश्मकश मे ये पल हैं 
चुनु राहे वफा या टूट के बिखर जाऊँ 
राहे वफा क्या है ये न जानु
।। सोचता हूँ अब तन्हा होके ये जिंदगी क्या पहेली है।। थी वफा किसी से वो हो गए पराए 
टूट गएे सब ख्वाब मेरे वो चेहरा निकला फरेबी 
क्यूँ अब नफरते हैं खुद से ये न जानु 
की कई कोशिशे वफा की खुद से 
रूह ने अक्सर नजरे हैं मुझसे चुराई 
अब मे न जानु ये वफा क्या है 
।। कश्मकश भरी ये राहे क्या हैं।।
चलता रहा दर-बदर आवारा सा 
दर्द न जानु बुरा क्या है 
जी गया कब से इंतज़ार मे 
अब ये निगाहें है तेरी तलाश मे 
मे न जानु के आवारा दिल क्या है 
तू भूल गया हमे एक पल में भले 
हमे याद रहा तेरा हर पल जैसे 
क्या दर्द है ये न जानु मे 
क्या सिलसिला है ये कैसे भूलूँ मे 
।। सोचता हूँ अब अक्सर ये जिंदगी क्या पहेली है।। 
।। कभी लगे उलझी सी है कभी लगे सुलझी सी है।।
हो गये ये पल भी अन्जाने
ये दिल न जाने कैसे
खो गये हो अब तुम कहाँ
ये निगाहें न जाने कैसे
गुस्ताखियाँ इन साँसो की तुझमें
लाखो है दूरियां मगर न कोई फासला रहा
रखा है तुझे खुद में जिंदा यूँ
न लगे तु कभी अजनबी सा
इन फासलो की विरानियाँ न जानू क्या है
।। सोच रहा हूँ अब तन्हा होके।।
।। ये जिदंगी क्या पहेली है।।

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