०१ क्या पा लिया है तुने उचाँइयों में जाके
शुकु से अब भी जी लेते हैं हम जमी पे रह के।
०२ मेरे अस्ख की बूंदों मे देख कभी खुद को
शबनम सा चमके है रूप तेरा।
०३ रात की सेज मे जगी है आँखें तमाम रात
शायद था कभी तेरी बाहों का इंतजार।
०४ कभी मिलो तो बताऊँ क्या सुकूं है अब इस दिल में
तुम हो सामने तो कोई बेचैनी नही है।
०५ रातों का क्या ये तो कट जाते हैं जगे-जगे
उनका क्या कहे जो दे जाते हैं चुभन इन आँखों को।
०६ देख के तुझे इक हलचल सी थी सीने में
अब धङकने भी महसूस नही होती।
०७ सोचा अब न कशिश बाकी रही इस दिल में तेरी
तन्हाई मे बहते अश्कों ने हकीकत बया कर दी।
०८ चाँद से बयां कर बैठे के ख्वाहिश है तुझे पाने की
अक्सर हमें देख अब वो बादलो मे छुप जाया करता है।
०९ कोई सुबह तो गुजरे दीदार से तेरे
कोई एेसा पल तो गुजरे बिन इंतजार में तेरे।
१० कहते है जिदंगी एक बहार है
तो दुखो का आना क्या एक पतझङ है।
११ तुम वाह भी न कर पाये मेरे अफसाने पे
हम बङे फक्र से ये सोचते हैं के
किस अदांज में लिखे तेरी यादों को।
१२ नफरत है उजालों से हमें
किसी का तसव्वुर अंधेरे मे लाजवाब बनता है।

१३ यादों का आना भी यूं अच्छा नही होता
बिन मदीरा भी इनमें इक नशा होता है।
१४ आँखों से आज भी नशा होता है
ये बात और है आज वफा शराबों में नजर आती है
मेहबूब आज दूर हो जाते हैं बिन कहे
ये शराब है कि चढ के भी नशे मे कुछ कह जाती
है।
१५ न छलकी वफा इन लफ्जों में
बरसों से इनकी जुबा निगाहें थी
तुम पढते रहे जुबां मेरी
हम सब कह गये आँखों से।
१६ कहते थे कभी तुम्हें हम जिदंगी
कुछ तो बोलो अब तुम्हें क्या कहें।
१७ इश्क क्या है कैसे बयां करें
खुद से मुहब्बत आज तक न कर पाये।
१८ मुहब्बत सदियों से रुलाती आई
कितनी बेखौफ है इसकी मासूमियत
अब तक कत्ल न हुई।
१९ क्या जादू था तेरी निगाहों का
तुझे देखा और सब भूल गया।
२० चलो आज इश्क को सिर्फ वफा लिखते हैं
तेरे लौट आने की एक झूठी कहानी लिखते हैं।
२१ भूल गया जो इक पल में अरसों
क्या वो याद रखेगा इक पल को बरसों।
२२ तु आसमां सा लगे में ये जमीं सा
प्रकाशो कि दूरी हैं इंतजार बरसातों का रहा।
२३ वो आसमां को पास देख लेना पानी की रहमत है
चाँद को छू पाना जमी पे।
२४ अब जो बात कर रहा हूँ वो न इत्तेफाक है
न वो ख्याल है तु रूह की ख्वाहिश है
बस यही मलाल है।
२५ गहराई चाहत की न समझ आई
अब तक हैं इंतजार मे न मिलन की कोई बहार आई।
२६ हर वक्त है तेरा हमशाया
जिसमे मे तन्हा दिखा
वो आइना झूठा था।
२७ मेरी ख्वाहिशों की राख हो तुम
तूफा से पहले उङ जाना के कोई मलाल न हो।
२८ मैने उम्र की सीमा नही बाँधी
आये कभी खयाल तो बुढापे मे ही मिलने चले आना।
२९ वफा है सीखी तो दर्द पा रहे हैं
काश आती हमें भी बेवफ़ाई तो शुकू से
रह पाते।
३० तुम मेरे लिये न थे बने तो क्यूँ मुझे इश्क हो गया
था खयाल खुदा का तो क्यों उसके दिल में कशिश
बाकी रह गयी।
३१ खातिर तेरे तन्हा हूँ मे आज भी
काफिर सा लगे तु बदनशीब जिदंगी में मेरी।
३२ जिता हूँ हर लम्हें तुम्हारे अकेले
रहता हूँ खोया बिन तेरे
तुझे जब पाया खुद ही खो गया
मिला तो बस दिवाना।
३३ लाख कह लो तुम आजाद हो मुझसे
हमने कब का नजरों मे कैद कर लिया तुम्हें।
३४ तेरी मगरूरियत मेरा तब्बसुम
तेरी नफरत मेरा प्यार
बेशक आज हारा है
तेरी जिद मेरा सब्र।
३५ करते रहे हम एक परछाई का पीछा
मिला तो वो अजनबी सा।
३६ ये इश्क की तालीम बङी बुरी होती है
सब सीखा के आदत किसी की लगा के
जुदा कर जाती है।
३७ अब साथ नही चाहिए
खुद को अपना खिलौना बना डाला
यादों की बेइन्तहाई ने हमें जीते जी मार डाला
तीर तो बहुत लगे इस जिगर में
दर्द तब हुआ जब तेरा नाम आया।
३८ ये इन्तजार है उम्र तक
ये साँसे हैं जिदगी तक
दर्द है हर आँसूं तक
तुम थे इक पल तक
सकूँ हो कभी तो कैसे
तेरा इश्क है मेरी रूह तक।
३९ तब्बसुम है उसका खयालो में बसा
वो कहां है ये नही जानता।
४० कुछ यूँ असर हुआ तेरे इश्क का
लगता है सोते भी बस ख्वाबों में है।
४१ हैरत भरी ये निगाहें मेरी
चौंक जाती है अक्सर हसी ख्वाब देख कर।
४२ बहारें हैं जिन्दगी में एक कदम से
बिन तेरे न होना वाकिफ उस कदम से।
४३ इश्क का नाम खुदा ने लिया
भुलाने का दोष क्यू इंशा को दिया।
४४ वाकिफ तो हैं हम हँसी से
मुस्कुराया जाये कैसे ये नही जानते।
४५ सुकून देख लो जिन्दगी में चाहे जितना
मिलता बस तकदीरों से है।
४६ आज खुद की लकीरों को भी
किसी और की हथेली में जाते देखा है
खुद की साँसों को किसी और का
होते देखा है।
४७ चाहे कर लो जितना भी इश्क किसी से
कत्ल हो जाता है बेरहमी से।
४८ मुहब्बत भरे लफ्जों में बयां था एहसास मेरा
इतना कठिन क्या था के उम्र भर न समझ आया
तेरी खामोश जुबा पढ के मुड गया राह से तेरी
में तो लफ्जों मे बयां था।
४८ एक हुनर सीख रहा हूँ
टूटे सपनो को समेटना सीख रहा हूं।
४९ बे समझ दर्द क्या जानेगी
आँसू भी चख ले तो नमकीन ही समझेगी।
५० आज गुजरा इक झोंका बगल से
वा खुदा धड़कनें हैं एहसास हो गया।
५१ जब भी ज़िक्र उसका करता हूं दिल टूट जाता
अब इतनी हिम्मत दे मुझे ऐ खुदा कि जिन्दगीभर टूट सकूँ।
५२ तु चाहे दर्द ही सही इस दिल का
तेरे आने से हँसी सी तो आती है इन लब्बों पे।
५३ जब भी चाहा तुझे करीब से देखना
दिल जलाया है तुने।
५४ जिन्दगियाँ हैं कितनी हसी
देखी है सब के नजरिए से
हम से तो इसका वास्ता ही न रहा कब से।
५५ तुम फनाह हो गये तस्वीरों में देख के महबूब अपना
हम तो दीदार उनका कर आये थे।
५६ इन्तजार-ए-जिन्दगी भी क्या खूब होती है
कट जाती है इन्तजार करते करते
जस्न हो कभी वो रूत ही नही आती।
५७ और भी दिलकश होता इन्तजार-ए-मुहब्बत
अगर वो झूठ ही कह देते थोडा सब्र रखो हम लौट आयेंगे।
५८ जब तक हैं तेरे लब्बों पे हंसी
हश्र ना मेरा बुरा होगा दर्द से
इन लब्बों की हंसी का भी कोई माइने ना हो
कभी जो कोई अश्ख हो तेरी आँखों में।
५९ याद आने लगा कोई बिसरा सा
फिर से ये दिल उदास होने लगा।
६० नजरबंद है मेरी ज़िंदगी तेरी यादों से
इंतकाले मुहब्बत तो देखो नजरों से आज भी आजाद हूँ।
६१ कहीं दूर से आता कोई लम्हा तु लगे
गम के इस दरिया में खुशी का मौसम तु लगे
हँस लूँ इन लफ्जों पे आता लम्हा तु लगे
या रो लू इन लफ्जों पे दरिया मे खुशी तु लगे।
६२ फकत उन साँसों का क्या जो निकल गयी इस जेहन से
मरके आज भी मौजूद हूँ तुझमें बस तुम्हें ही महसूस नहीं।
६३ समझ न सके जो मेरी जुबां
क्या उम्मीद करू वो समझेंगे बेजुबा दिल।
६४ लोग कहते हैं कुछ बीते लम्हें साथ तो यादें बनती है
में कुछ यूं सोचता हूँ
किसी आप सा का खयाल भी यादें होती है।
६५ शहर भर की रोशनी मुन्दने लगी
दो आँखें अब भी हैं जागी
होने लगा अजनबी सा इन अन्धेरो में
किसी का खयाल फिर डूबौने लगा।
६६ तेरी हँसी मेरा पागलपन
तेरी सादगी मेरा भोलापन
बनने लगा धीरे-धीरे
तेरी दूरी मेरा दीवानापन।
६७ आ के कर कभी गुफ्तगू मेरी यादों से
तेरा कोई निशां है या नही
खामोश रहे तो समझ जाना
ये अदा है तुम्से सीखी।
६८ हां मे हार गया तुम्हें न पा के
बेसख तुम भी हारे हो हमें खो के।
६९ अरदास किया तेरे वाहे गुरू से
के तु रूबरू न हो इस इश्क से
मे पत्थर बिखर गया दर्द से
फूल को रब राखे।
७० पहले डर जाता था कमरे में तुफां की आवाज सुनकर
चलने लगा हूँ जबसे आड़े-तिरछे रास्तो पे
तुफां में चलना सीख लिया।
७१ एक लहर सब कुछ सीखा गयी हमें
सिवा तैरने के।
७२ मन था जलेबी खाने का
लोग रसगुल्ले और बर्फी लेके आये घर मेरे।
७३ टूट के कोई सम्भालेगा भी तो क्या बस टुकड़े।
७४ इस जिदंगी को क्या जानते हम
बस वही जीते गये मुझ में।
७५ ये बारिशें क्या भिगोयेगी कोई तरबतर है आँसुओं में।
७६ आईना तो बहुत देखे हम बस अफसोस
है कि खुद को कभी ख्वाबों में नही देखा।
७७ मत सोच मेरे हालात पे इतना कि तुम्हें हँसी आ जाय
कभी देख इन निगाहों में बस तेरा ही ख्वाब अधूरा रह गया।
७८ हूँ तो में इतना बुरा कि कुछ भी अपशब्द कह दूँ
कुछ लोगों को सोचता हूँ बुरा कैसे कहूँ।
७९ कोई जल्ते-जल्ते बुझ गया उन्हें देख के
वो चका चौंध की दुनिया में थे
जहाँ बुझते दीये नजर कहाँ आते।
८० वो नजर अन्दाज करके वफाओं को मेरी
चले गये धोखे की राहों में
अब देख रहा हूँ उस शख्स के
दिल की कीमत क्या थी।

८१ वक्त से न पुछो दामन में क्या संजोए है
कभी धूप तो कभी छाँव समेटे है।
८२ हर दिन उम्मीद जागती है
जब धूप मेरे छत पे खिलती है
हर शाम चाँद के साथ खत्म हो जाती
थक गयी ये निगाहें वो सुनसान राह देख के
दिल में वो लम्बा रास्ता खटकता है।
८३ ये दरारे न जाने है किसने डाली
बिखर गई है आवाजें कुछ इधर कुछ उधर
पुकारा तो उन्होंने भी था शायद
आते तो वो कैसे मेरे कानों तक।
८४ मेरी आशिकी का ना यूँ मजाक बनाओ
आज भी लिखता हूँ अफ़साने सच्ची मुहब्बत के मे।
८५ अभी में रूबरू नही उस शख्स से
बस उसकी सोच तक मे अच्छा भी हूँ मे बुरा भी।
८६ कोई मरके भी जिन्दा है यादों में
कोई जिन्दा रह के भी मर जाता है यादों में।
८७ खोजे तो बहुत थे अपनी राह में निशां
पर तुम शायद किसी और राह पे चल पड़े थे।
८८ मगरूर तु भी है कहीं
मजबूर हम भी हैं कहीं
चलो अब टूटने दूँ वो गाँठ से जुड़ा धागा
अब तू भी रहे खुश कहीं
में भी रह लूँ खुश कहीं।
८९ शक्ति श्रीण होके गिरा था जमीं पे
कागज़ो मे लिखे मेरे सपने जल रहे थे।
९० टूटता नहीं मे बुरे वक्त से
चुनौतियों का मे शौकीन हूँ
चुरा ले चाहे कोई दिल मेरा
किसी के आँसुओं का मे गुनहगार नहीं।
९१ लिखता नहीं मे खामोशी लफ्ज़ फिसल जाते हैं
बड़े मतलब की होती हैं ये खामोशियाँ
कहीं ये बेमतलबी न हो जाए।
९२ जब न थी सर पे छत मेरी
जमीं पे सोने को चदर मांगी
तो एक रूमाल तक नशीब न कर सके वो
रहता हूँ अब आलीशान महलों में
अब उसके दुपट्टे का मे क्या करूँ।
९३ लगाये जो है ये दाग मेरे दामन में तुने
धोना पड़ेगा एक दिन आँसुओं से तुम्हें।
९४ लगाया है तुने जो काजल कहीं रात हो न जाए
बिखेरी हैं तुने जो जुल्फें कहीं ये बहारें आ न जाए
लगाओ न होठो पे लाली कहीं गुलाब खिल न जाए
पी लो मेरे संग दो घुंट शराब की
कही नशा भी तेरे हुस्न से न हो जाए।
९५ दरिया कभी उल्टा नही बहता
आँसू कभी घुटनों से नही बहते
हो दरियादिल तो किसी की जिंदगी सवारों
कहने से सिर्फ कोई इंसा नही होता।
९६ एक लम्हा सा जो टूटा है वक्त से
दो आँखें जो जगी है रातों तक उनसे
कुछ आँसू जो गिरे दर्द से उसके
और कोई अब भी सोचता है
वो कौन सा लम्हा था जो छूट गया था वक्त से।
९७ आँखों में न मेरी झलकियां होंगी
न टूटे सपनो की सह होगी
बना ली मैने अधूरी तकदीर-ए-तस्वीर पूरी
अब न कोई और इल्तिजा होगी।
९८ पिछे देखता हूँ अक्सर उन्हें
पर आज भी हम अकेले खड़े हैं।
९९ दल दल मे फंसी सी जिंदगी लगी
बद किस्मती आज फिर वो बेरहम याद आया।
१०० पछताओगे एक दिन तुम
अपनों के वजाय गैरों पे यकी करके।
१०१ तमामे हुस्न मुहब्बत का लिख दिया दुश्वारे रातों में
निशर्ते एहसासों का क्या तुम्हें वास्ता दूँ
है तेरे रूख मे चाँदी तो रोशन ये रातें कर दे
फिर तेरी यादों में मेरी नींदें है टहलने लगी।
१०२ भूल आए तुम कुछ पल अपने मेरे सिरहाने तले
ख्वाब तो आयेंगे ही तेरे।
१०३ आईना क्या देखेंगी वो आँखे
जिनपे हम गज़ल लिख गए।
१०४ सपनों की एक अदा है सनम
सादगी लेके आना जैसे
उनकी आदत है सनम
खुश हो जाता है ये दिल यूंही
आज भी वो चेहरा देख के सनम।
१०५ तोड़ जाते हैं जो लोग रिश्ता रूह से
वो जज्बातों की बातें नही जानते।
१०६ आज भी दिलचस्प हैं बातें उसकी
बातों मे आज भी सुर होता है किसी की यादों का।
१०७ तेरे सपनों की तकिये पे हूँ सोया
देखते हैं कौन सा ख्वाब अधूरा होगा।
१०८ में खो गया था उनमें कहीं
वो आते तो खुद का पता चल जाता।
१०९ हुआ जो कभी तुझे अफसोस मेरा
ये गलती बस तेरी रही
मैने एक नहीं हजार कोशिशें की तुझे अपना बनाने की।
११० खता नहीं नजरों की मेरी के आज हम देख नहीं पाते उन्हें
वो ही खुश थे दूरियों से मेरी।
१११ रंगों का ज्ञान नहीं मुझको
इसलिए में पेंसिल से तस्वीरें बना लिया करता हूं
बेशक ये सूखे पत्तों की तरह लगती होंगी बे रंगी सी
पर उसकी तस्वीरों में आज भी नजरें थम जाती है मेरी।
११२ बड़े लोगों से मिलने मे फासला रखता था
और वो सोचते थे कि मुहब्बत में मिलने की बड़ी जिद़ रहती है।
११३ सच और झूठ का बस इतना सा फासला है
झूठ से समस्याएं शुरू होती है
और सच से समस्याएं खत्म।
११४ एक अच्छी नींद में एक हसीं ख्वाब का आना
खीर में चीनी का ज्यादा होना लगता है
उसका मुझे ख्वाबों मे छूना भी कयामत लगता है।
११५ बचपन में मे ख्वाब नही देखा करता था ये सोच
के की इन्हे बनाऊ कैसे
एक दिन सपना दिखा तो समझा
ख्वाबों को देखने के लिए
पर्चे पेंसिल की आवश्यकता नहीं होती।
११६ आग और समन्दर में दोस्ती हो सकती है
नजदीकियां नहीं।
११७ दे दीजिए किसी को जहर पर यादें न दीजिएगा
यादों को बड़ी आदत होती है बेवक्त आने की।
११८ हर रोज आती हो अब तुम ख्वाबों में
तुम ही बतला दो ये माज़रा क्या है
हम कह बैठे कुछ तो लोग मुहब्बत कहगें
तुम हि बता दो ये तेरा मुझसे वास्ता क्या है।
११९ रोक लो ये शिलशिले ख्वाबों के
दिल को तन्हा और बेचैन करने के
है ख्वाब मेरी ज़िन्दगी बनने का
तो चुपके से मेरी साँसों मे समा जाओ
यू ना नब्जों कि तरह आने जाने का डर दिलाया करो।
१२० मेरी मौत की दुआ करने वाले हज़ारों हैं मगर
मेरी ज़िन्दगी की दुआ करने वाला खुद मे भी नही।
१२१ न देखी उसने एहसासों की बारीकियाँ
वो नूर का प्यासा यूं… नज़र उठा के
नज़रें फेर गया।
१२२ मै यकीन किया की वो जुबान-ए-खुदा होगा
वो लेजा के मुझे तन्हाइयों से कत्ल किया।
१२३ झूमता तो है तन्हा इन्सान भी कहीं
जहाँ कोई गाने नहीं मुहब्बत की बौछारे गिरती हैं।
१२४ है इस ज़िन्दगी में खुशियों का वास्ता मेरी मेहमानों सा।
१२५ बसा के तुझे दिल मे भूलने की जिद्द की है
एक और मौत मरने की साजिश की है।
१२६ टूट जायेगा मेरे इश्क का भ्रम एक दिन तेरा पराया होके।
१२७ जिसे सोच के मर जाने को दिल करे
वो इश्क हो ही नही सकता
हमने महसूस किया है
इश्क में जीने की ख्वाहिश होती है।
१२८ सब वास्तो से तेरा वास्ता अलग था
बिना मिले तेरा तसव्वुर आना एक रास्ता था
ना जाने फिर भी
ले कर चला हूं जब भी हसरतें तेरी
दिल टूटा है हर बार मेरा।
१२९ पहला दूसरा या आखिरी कोई शख्स बुरा न था
था जो कोई बुरा वो बस मेरा मन था।
१३० मे दिलों को जोड़ने की बात करता हूं
तुम ऐसा कुछ मत करना की मुझे दिल घटाना पड़े।
१३१ कई खामियां की कुछ रिश्तों ने
मे दिल जोडने के वजाय घटाता गया
फिर आके वही रिश्ते मुझसे सवाल करने लगे
तुम्हारा दिल इतना छोटा क्यूँ है।
१३२ वो देखा मेरी आँखों को गौर से
मे समझा वो अब जाना है मुझको
वो देख के मजबूरियों की झलक मेरी आँखों मे
फिर दगा दे गया।
१३३ मुझे उस सख्श से नफरत इसलिए नहीं हुई
के वो गलत कदम उठाया
मुझे नफरत है उससे इस वास्ते
कि वो अब भी बड़े गुरूर से कहता है
के उसने कोई गलती नहीं की।
१३४ सुनने लगा हूँ सदायें तेरी शायद टकराने लगी हैं
बातें तेरी मेरे दिल के फर्श से।
१३४ एक कदम उठाना कितना आसान है
कुछ पल चले और पँहुच गये जहाँ जाना था
कई निसान मिटाये उसने दिल से कितना दर्द दिया
काश के वो इंसान ये जान पाता।
१३६ वो फ़ैशनपरस्त बातों में विश्वास करते थे
हम उनसे सादा ही प्यार कर गए।
१३७ कहने को कई हमदर्द हैं इस जहाँ में
कोई तन्हाई बांटे तो बतलाना।
१३८ खैरत से हैं हम हाल-एे-तगीं में
पर तेरे ख्वाबों ने अमीरी दिखा दी।
१३९ लोग हमें पत्थर कहते थे और उन्हें फूलनुमां
जब भी हम टकराये न जाने क्यूँ चोट हमें ही आई।
१४० हम उनसे तकरार करते भी तो क्या
जब भी वो रोये दर्द हमें हुआ।
१४१ लाख बुरा कह लो मुझे मे अपनी सच्चाई मे जीता हूं
किसी के नजरिए में नहीं।
१४२ रूप में मोह गुण में अभिलाषा
दर्द की है यही परिभाषा।
१४३ शादी के दिन सबको हँसते देखा
तो लगा सब मिल के खुशियां लाने गये हैं
के थोड़े रोनक हो घर में
अब ये महसूस हुआ है हमें वो हंसते थे इस वास्ते
के हम रिश्ता जोड़ आए है हंसते-हंसते दर्दों से।
१४४ दूर जाने से काश
कुछ वो मुझमें बदलते जो बुरा था
कुछ में उन्हे बदलता जो उनमें बुरा था
एक अच्छा रिश्ता बन जाता।
१४५ जो खुद ही चले गये
उम्मीद करूँ वो लायेंगे राहत मेरी।
१४६ सुनता हूँ आहटें हरदफा जब भी रहूँ तन्हा
शायद होगा कोई हमदर्द पुराना
महसूस है जिसे मेरी तन्हाइयों की घड़ियाँ
काश कि वो बनता हमसफर मेरा
न रह जाती आहटें बस दरमियान।
१४७ बिन कहे एहसासों को समझना आसान होता तो
मेरे रिश्तों को मुझसे शिकायत न होती।
१४८ वो सपनों का मन्जर गुजरता नही है आँखों से
एक वही पल था जब तु मेरे इतने करीब था।
१४९ आज यकीन हुआ तु आसमाँ है में जमीं
देखने में बड़ी नजदीकियां लगी पर बड़े दूर हो तुम।
१५० तुम बदल लो लाखों लिबास एक रोज में
शायद कुछ अलग दिख सको वरना
इन्सान तो खुद ही एक लिबास है रूह का।
१५१ गुजरते हो हररोज तुम मुझे छु के
लिखने लगा हूँ जबसे तुम्हें हवायें।
१५२ अंगारे सा है इश्क मेरा जख्मों पे ठंडा मलहम सा
मुझे अपनाने से पहले खुद की फिक्र कर लेना।

१५३ मेरे अपने सोचते हैं काश मेरी बातों में
थोड़ा मीठापन आ जाये
मे डरता हूँ इस मीठेपन से
कहीं मेरे लफ्जों में झूठापन न आ जाये।

१५४ बेरूखा कहते हैं लोग मुझे
पर मेरे रहने से ही वो खुद को बेहतर समझते हैं।

१५५ कभी रूकने दो खुद को मेरे दरमियान
जरा धड़कनों को सुनने दो
ताउम्र नफरत का वादा किया है
हर नब्ज को बेरहम परखने दो।

१५६ टूट जाते हैं अक्सर रिश्ते जिदों के आगे
अकड़ फिर भी रह जाती है एक जिंदा लाश बनके।

१५७ सजा तो शामें करती है चाँद सितारों से
तुम तो उजली-उजली सी सुबह हो।

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