हम इन्तजार किए वो दूर चले गये
सोचा कुछ दिनों मे लौट आओगे
शायद उन्हे जाना था बहुत दूर
अब भी उम्मीद लिए हूँ आँखो मे
कभी तो उसकी राह पूरी होगी
फिर मिलेंगे वो हमसे उसी अदा मे
अब तो ये मुमकिन नही
के वो कहे हमें अपना
हम खोजते गये उन्हें अपनी राहों मे
वो चल बैठे पराई राहों पे
लौट आना एक दिन
हो अब शायद कितनी भी उम्र तेरी
इन निगाहों मे आज भी वो चेहरा बसा है
वक्त की शर्त न रखी है मैने
बस तुम्हें देखने की जिद लिए बैठा हूँ
हो मन तो आ जाना एक पल के लिए
वरना तन्हा मिटना तो इन्सानियत है

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