रूह को भी थामा है तेरे आने तक
के इक साल गुजर गया इन्तजार तक
अब भी ये उम्मीद लिये बैठा हूँ न जाने कब तक
के सुबह आँख खुले तो तेरा इन्तजार न हो
के कुछ खोने का एहसास न हो
जी करता कभी इस बात पे रो लू जी भर के
के तेरा जिक्र आये तो फिर ये दर्द न हो
के सिर्फ ये दिल है एहसास तुझपे बाकी रहा
रूह है कशिश तुझपे बाकी रहा
के ये दुवा है कि तु एक बार आये
चाहे अकेले हो या हमदर्द साथ लाये
के इक ख्वाहिश है कि तुझे देख के ये लब मुस्कराये
के तु आये या पागल सा खुद में मुस्करायें

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