ये नजारा भी देखा है
किसी गरीब की आँखो मे घर का सपना देखा हैं
वो खुशी लाजवाब देखी है
खुशी मे भी उनमें भरे आँसू देखे हैं
वो कागजो पे  बनाये घर के नक्शे
महज जो अधूरे रह गये
वो सपने जो कहीं कौनो में धूल खाते रह गये
फिर भी रोज जी रहा है ये उम्मीद लिये
के होगा भाग्य उदय इक दिन मेरे लिए
कहते तो सब हैं के मेहनत के आगे भाग्य नही टिकता
क्या वो पसीना वो थकान इक भी मेहनत की निशानी नहीं
हालत है जो आज देश की वो अमिरो की पैदाइश है
कभी हम भी अपना हक लेते थे
अब उस हक के भी पैसे लगते है
कहते तो थे की अच्छे दिन आयेगे
शायद ये किसी नेता के लिए नही महज इक उम्मीद थी
जो अब भी बरकरार है कि अच्छे दिन आयेंगे
हर दिन भूखे रह के जोङे थे कुछ सपने के अब अपना घर होगा
दो ईंट ही खरीदी थी घर की के महंगाई से पैसे कम पङ गयें.

  "ये जंग नही अमीरी गरीबी की
 बस ये वक्त नही गरीबी का 
 जो पैसो से उनकी बारी पे काम निकाल ले 
  वो शख्श दुश्मन है गरीबो का"

… अब तो सामर्थ ही न रही के कुछ और जुटा सकूँ
जो खाना था वो भी लग गया ईंटों पर
अब टूटे सपने लेके चले है आशियाने की खोज में
के मिला भी तो सङकों के किनारो पे
के अक्सर नींद टूट जाती  ङर से वो आवाज सुनकर
शराबियों की गाङी तेज आवाज करते निकलती है जब बगल से
अब तो आँसू भी आँखों में ठहर गये के दर्द भी होता है तो किसे सुनाये
कोई मसीहा नही के फरियाद करें जिससे  एेसी कोई दवा नहीं के दर्द की राहत हो जिससे.

"के ख्वाबो का एक मसीहा लिख रहा हूँ 
 जो करे हर सपने मुकमल तेरे 
 ए बन्दे हो इतनी औकात मेरी
 के तेरे कुछ काम आ सकूँ "
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