दो टुक ही क्या जिये थे कि जिदंगी दुख बसर हो गए
अब देख भी लू शुबह की रोशनी ये जिदंगी परदानशी है
क्या दिन अौर रात का मन्जर देखु अब एे जिन्दगी ये अन्धेरे ही तेरी कायनाथ हैं
देख के अन्धेरे में एक रोशनी की झलक
मन तेरी ओर खींचा सा जाता है
एक किरण की उमीद मे जिना  भी भारी सा लगता है
अब छोङ दी तेरी उमीद कि रोश-ने जिन्दगी होगी
अब खुशी मे भी गम सा जीने की आदत सिखनी पङती है
गमनम है ये दिल की सांसे भी रूकती हैं
कभी सिसकती सांसे भी लगती थी की अाज ठंड बहुत है
वो मदं मदं तवसुम की झलकियां हवाओ का रूख भी बेमिशाल लगता था
अब देख ले कभी अईना तो हर माैसमे पतझड़ नजर आता है
कभी पर्वतो पे बिछी वर्फ की चादरे तेरे सुरख चेहरे का नूर सा लगती थी
कभी तेरी घटा सी जुल्फों का अवलोकन भी  इन फिजाओं में कर लेते थे
जब से ये दुनियाँ चाँद को छुने लगी है अब फिजाये भी फीकी सी नजर आती हैं
कभी लिख लेते थे कुछ लफ्ज इन नदियों पे जिनमें हवा से लहराती तेरी जुल्फों का साँर नजर आता था
पर्वत भी काली चादरे ओढे बैठी है
इनकी साँसे भी ठंड से सिसकने लगी हैं शायद
अब वो लफ्ज ही न बचे की सूखी नदी में जल लिख सकू
मायूसी इस कदर तोड़ गयी की वो हालत ही न रही कि कुछ और नामे वफा लिख सकूँ

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