हवाओ ने रुख बदला है बारिश होने को है
फिजाए टकराई हैं पर्वतों से ऋतुए बदलने को है
हो ऐसा कोई समा दोनों एक साथ हो
न हा-थे -ईश्वर है न प्रकृति
के  हो जो कलम  हाथ मे
हर मौसम-ए-बहार बस किताबों मे है

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