क्या है इश्क़ तेरा एक नशा सा
निगाहों मे एक सुरूर  सा
जी रहे हैं ये ज़िंदगी क्या कम है
इस मोड पे जीना भी खुद गरजी है
लबो पे हंसी है तो न देख उदासी मे
दिल के दर्दों का मौसम भी अजीब है
कभी निगाहे ढूंढती है तुम्हें
कभी देख ले तो इनका दरिया भी गमे नम है
अब तो दुआ है कि  मुलाकात न हो
अरसा लगा है दिल को अपना  बनाने मे
कि ये फिर से तेरी ओर न हो
डर लगता है अब उस पल से भी सायद
के गुजरे तेरी शामे किसी और के आसियाने मे
यूं तो दीवारे न हैं मेरे घर मे
के तू आए तो मे दीवार बन जाऊ
मिल तो जाते हम तुमसे कबके
के तेरे सपनों मे आनाजाना कम है
लौट आ सबकुछ  छोड़ के 
न आए तो फिर ये दर्द का रिस्ता क्या है

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