एक दिन के खयाल से जी रहा हूं
लम्हों के रूकने की राह देख रहा हूँ
शुष्क आँखों से कब तक देखूँ
इनके नम होने की हद देख रहे रहा हूँ
बरसे कभी शावन से या बस नाम के
दिल के मानसून की हद देख रहा हूँ
इश्क तो बेपनाह है उसके लिए
पत्थर दिल है वो अगर तो वो हद देख रहा हूँ
कभी मुड़े वो पीछे वो पल देख रहा हूँ
भले ही खाक उड़े इश्क की उसपर
हवा का वो रूख देख रहा हूँ
हम खामोश हो गए खुद के आगे
जो हवा छुई थी हमने
उससे तेरे बचने की अदा देख रहा हूँ
कबतक है ये बेरूखी बस आखिरी हद देख रहा हूँ
कबतक टूटेगा ये अन्जाना भरोशा
एक वो दिन देख रहा हूँ

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