ज़िक्र आते ही तेरा होंठो पे हंसी आती है
एक अंजानी सी खुशी न जाने दिल मे थम सी जाती है
तुझे पाने की तमना रोज किए जाता हूँ
तेरे आने की दुआ अधूरी सी नज़र आती है
देखता हूँ हर रोज ख़यालो मे तुझे
रूह को भी इश्क़ मे भिगोते हुए
होश आते ही लौट चला आता हूँ
खुली आंखो से हर मज़र वीरान नज़र आता है
देखा था इन आँखों ने एक पल ही तुम्हें
खो बैठा हूँ अपना ही  दिल गैरो मे कहीं
लिखे हर अफसाने तेरी यादों मे
इस ज्यादा क्या मुहब्बत का यकीन दूँ मे तुम्हें
चाहे इस जहां मे न सही
मिलोगे एक दिन ये यकी है मुझे
हर दिन इस उम्मीद मे जिये जाता हूँ
मेरे रूह की अजमहिस थी तू
आज भी सीने से लगा बैठा हूँ
तेरे संग महसूस किया था जो पल
अब तक उसे  न भूल पाया हूँ
यूं तो मिलते है हर शाम तेरी यादों  से
इनके रुकने का कोई एतबार नहीं
अब तो हर ख्वाब तोड़ दिये हमने
तुझे पाने की “आरज़ू” छोड़ दी हमने
तेरी जिंदगी है उजालों मे पली
हम तो अंधेरों मे जिये जाते हैं
अब न कोई ज़िक्र तेरी यादों का आता है
अब तो हर वक़्त तेरे नशे मे चूर होते हैं

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