माना कि इस पल मे मुहब्बत की थी तुमसे
न तुम्हें पाने की शर्त रखी थी हमने
चंद बातें करने की ही तो ख्वाहिश की थी
हां कुछ पल बाहों मे भरने की तमन्ना की थी
आँख भर आने तक तुम्हें देखने की तमन्ना की थी
इसमें गलत भी क्या था इस पहले किसी और की चाहत भी तो न की थी
हमने तो तेरी हंसी की दुअा की थी अपने लिए
तेरे दर्दो का सिलसिला तो मेरी इश्क की मन्जिल न थी
मेरे नजरो मे तेरी कोई गंदी तस्वीर तो न थी
फिर क्यूं सिर्फ मेरा इश्क अधूरा रह गया
मेरे हाथो मे तेजाब था न आँखो मे हवस
फिर क्यूं उसकी नजरो मे मेरी ये तस्वीर बन गई

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