किसी पराए पे यकी करने चले थे
आज किसी अपने ने दिल पे चोट दी है
अक्सर नजरे उठाके चलते थे आज किसी ने झुकाई है
वो गलत हैं अपनी गलती का उनको एहसास तक नहीं
फिर क्यूँ ये लजत हमे मुफ्त मे दे दी
दुनिया को सुधारने चले थे की दोषी बहुत हैं यहाँ
देखा तो घर मे ही दोसी  मिल गए
सही है जो क्यूँ बंदीसे भी उसी के लिए है
गलतों के लिए तो एक लकीर भी नहीं
काश की कोई जलाने की चीज होती इस दिल  मे
हर दर्द भरी यादों बातों को जला देते
रखे भी तो कब तक इन बातों को तफ्न सीने मे
चले थे बसाने किसी को दिल
आज जगह तलाशी तो कोई कोना तक न बचा उसके लिए 

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