मुहब्बत लफ्जो मे बयां नहीं हो सकती 
लिकता हूँ जब अफसाना तो 
मतलब मेरे जज़्बातों का छोटा होना नहीं होता 
न ही कोई लिखने नशा छाता है 
जब घुटन करने लगते हैं ये जज़्बात 
तो अल्फ़ाजों में बयां करते हैं 
सुनने वाले कोई होते नहीं हैं 
तो कोरे कागजो पे फरमान लिखते हैं
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